नमस्ते दोस्तों,
मेरा नाम डॉक्टर विजय हैं और मैं एक नास्तिक (निरीश्वरवादी) हूँ. नास्तिक अर्थात ऐसा व्यक्ति जो ईश्वर ,अल्लाह, गॉड या किसी भी तरह की पारलौकिक शक्ति में विश्वास नहीं रखता।
लेकिन क्या मैं शुरू से ही नास्तिक था ? नहीं , बिलकुल नहीं!
मैं बचपन से लेकर उम्र के पैंतीस साल तक बहुत ही धार्मिक और श्रद्धालु व्यक्ति था. मेरी ईश्वर के प्रति श्रद्धा और भक्ति अपार थी। मेरी भक्ति एक आम इंसान की तरह केवल भौतिक मनोकामनाए पूरी करने के लिए नहीं थी, बल्कि ईश्वर का साक्षात्कार करके मोक्ष प्राप्त कर जीवन का कल्याण करने की तीव्र इच्छा से प्रेरित थी। ईश्वर से मिलना, उनके दर्शन करना, और स्वयं को ईश्वर स्वरुप जानना यहीं मेरे जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन चूका था। इस परमलक्ष्य को प्राप्त करने के लिए मैं अपना जीवन समर्पित कर चूका था. लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ जो आज मैं अपने आपको नास्तिक घोषित करता हूँ? इसी विषय पर आज मैं बात करनेवाला हूँ।
मेरी नास्तिकता ईश्वर से नाराजगी वाली नास्तिकता नहीं है. फिल्मों में आपने ऐसे किरदार देखे होंगे जो किसी कारण ईश्वर से नाराज हैं और उसी वजह से नास्तिक बन जाते है। मेरी नास्तिकता वैसी नास्तिकता नहीं है। मैं ईश्वर के अस्तित्व को ही नकारता हूँ. और इस इन्कार के पीछे भी ईश्वर से नाराजगी नहीं हैं. क्योंकि ईश्वर से नाराज होने के लिए भी उसके अस्तित्व को मानना पड़ता हैं। लेकिन जिसका अस्तित्व ही नहीं है उससे नाराजगी कैसी ?
मेरा यह निष्कर्ष की कहीं कोई ईश्वर या भगवान नहीं है , यह ऐसे ही नहीं आया। इसके पीछे मेरी वर्षों की खोज , अभ्यास और अनेकों प्रयोगों का आधार हैं। इसके पीछे विज्ञान है, तर्क है , विवेक हैं। ये सिर्फ मेरे अकेले की खोज नहीं है। ईश्वर का अस्तित्व मानने से इंकार करनेवाले कई सारे महान लोग इस पृथ्वी पर मौजूद रहें है। चार्वाक , गौतम बुद्ध, एपिक्युरस , सॉक्रेटीस , बर्ट्रांड रसेल, एलन वाटस , युजि कृष्णमूर्ति , डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर और शहीद भगत सिंह जैसी महान हस्तियां नास्तिक विचारधारा रखती रथी। और भी सैकड़ो ऐसे जानेमाने नाम हैं जो नास्तिक थे और उनकी नास्तिकता विज्ञान , तर्क , विवेक और खोज पर आधारित थी।
मैं इस विडिओ में अपनी आस्तिकता से नास्तिकता की और जानेवाली यात्रा के बारे में बात करनेवाला हूँ। मेरे यह अनुभव , निरिक्षण और निष्कर्ष सुनने के लिए अगर आप थोड़ा समय देते हो तो मैं आपको आश्वस्त करता हूँ की आपका यह कीमती समय व्यर्थ न जायेगा। आपको यह विडिओ धर्म और अध्यात्म में समय बर्बाद करने से बचा सकता है। अस्तित्वहीन चीजों के पीछे दौड़कर मैंने अपने जीवन में जो समय , पैसा और ऊर्जा व्यर्थ की है वह आपको न करना पड़े यहीं मेरा उद्देश्य है।
बचपन से मैं ईश्वर में आस्था रखता था। मेरे घर का माहौल बहुत ज्यादा धार्मिक तो नहीं था लेकिन मेरे माँ बाप ईश्वर में विश्वास रखनेवाले व्यक्ति थे। हिन्दू धर्म में मनाये जानेवाले सारे त्यौहार , पूजा पाठ किये जाते थे। धार्मिक और भक्तिमय कथाएँ , रामायण महाभारत , संतों के चरित्र और उनका साहित्य पढ़ते हुए मैं बचपन से युवावस्था तक पहुंचा। फिर आयुर्वेद की पढाई कर मैं डॉक्टर बन गया। मेरी इंटर्नशिप शुरू ही थी तभी मेरे जीवन में एक आध्यात्मिक गुरु का आगमन हुआ। उस गुरूजी का मुख्य आश्रम तो पुणे में स्थित था लेकिन उनका सत्संग नागपुर में भी हुआ करता था।
२००४ वर्ष चल रहा था। मैं अपना मेडिकल करिअर शुरू करने ही जा रहा था, उसी समय मेरे जीवन का आध्यात्मिक दौर शुरू हो गया। उस समय तक मेरी ईश्वर के प्रति श्रद्धा किसी भी सामान्य भक्त की तरह थी। नवरात्री में देवी की आराधना करना, महाशिवरात्रि पर शिवजी की उपासना करना, गणेश फेस्टिवल मनाना , गजानन महाराज को अपना गुरु मानना , यही मेरी भक्ति का स्वरुप था। लेकिन अब मैं एक जिन्दा गुरु की दीक्षा लेकर सत्य की खोज शुरू कर चूका था। अब मेरी भक्ति बढ़ती चली गयी। ऐसा कहाँ जाता हैं की गुरु के मार्गदर्शन में ईश्वर की खोज की जाये तो रास्ता आसान हो जाता है । ईश्वर की खोज में मेरी रूचि इतनी बढ़ती गयी की मैं अपने गुरु द्वारा दी गयी सारी साधनाएँ पूरी ईमानदारी और लगन के साथ करने लगा। इसके पीछे कारण था मेरे गुरु के द्वारा ईश्वर प्राप्ति के अनुभवों का वर्णन करना। खुद को एक आत्मसाक्षात्कार प्राप्त गुरु के रूप में प्रस्तुत करते हुए वो इस बात पर विशेष जोर देते थे की इसी जनम में ईश्वर को प्राप्त करना ही जीवन का मुख्य और अंतिम लक्ष्य है. और अगर यह परमलक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ तो जीवन व्यर्थ है। उनका अपने प्रवचनों में बार बार यह दोहराना मेरे मन मस्तिष्क में इतनी गहराई तक चला गया की मुझे अब ईश्वरप्राप्ति के अलावा जीवन का कोई दूसरा लक्ष्य ही दिखाई नहीं दे रहा था। और दिखाई भी कैसे दे ? स्वयं को एक ईश्वरप्राप्त गुरु के रूप में प्रस्तुत करनेवाला इंसान इतने विश्वास के साथ बार बार यही बात दोहरा रहा हो की ईश्वर को पाना ही जीवन का परम लक्ष्य हैं तो फिर मैं ईश्वर के सिवा किसी और चीज को चाहता भी कैसे ?
गुरूजी के बारे में परिचय देते हुए यह बताया जाता था की वह पुणे में स्थित किसी इंजीनियरिंग कॉलेज पर प्रोफेसर के तौर पर नौकरी किया करते थे. लेकिन ईश्वर से मिलने की अदम्य इच्छा ने उन्हें अपना अध्यापन कार्य का त्याग करके आध्यात्मिक खोज करने के लिए प्रेरित किया. और अंततः उन्होंने ईश्वर का साक्षात्कार कर ही लिया. उसके पश्चात् ईश्वरीय आदेश का पालन करते हुए उन्होंने सत्संग के माध्यम से लोगो को भक्तिमार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहित करना शुरू किया। मैं उनकी इस बात से इतना ज्यादा प्रभावित हुआ की मैं भी उन्ही की तरह ईश्वर के लिए सबकुछ छोड़कर उन्ही के पदचिन्हो पर चलने तैयार हो गया। अब मुझे ईश्वरप्राप्ति के सिवा और कुछ नहीं दिखाई दे रहा था. यह भक्ति की धुन मुझपर इस तरह सवार हो गयी की मई अपना करिअर , अपने बूढ़े माँ बाप , अपने परिवार और अपनी निजी ज़िन्दगी पर भी फोकस नहीं कर पा रहा था. दरअसल मुझे वो सब किसी काम का नहीं लग रहा था. गुरूजी कहते थे की अगर ईश्वर को पा लिया तो पुरे जीवन का कल्याण हो जायेगा. ईश्वर को पाने के बाद कुछ भी हासिल करने की जरुरत बाकि नहीं रह जाती. ईश्वरप्राप्ति से परम संतुष्टि की प्राप्ति हो जाती है।
मैं गुरूजी के प्रति इतना ज्यादा समर्पित था की उनकी हर आज्ञा का पालन करना मेरा परमकर्तव्य बन चूका था। उनकी शिक्षाओं में "सेवा" पर भी विशेष जोर दिया जाता था. सत्संग में सेवा देने से लक्ष्यप्राप्ति की गति बढ़ जाती है, ईश्वरकृपा जल्दी हो जाती है और मोक्ष का मार्ग आसान हो जाता है ऐसा वो कहते थे. ईश्वर तक जल्द से जल्द पहुचने की चाहत में मैं अब सत्संगों में रेगुलर सेवा भी देने लगा। छोटी बड़ी हर सेवा जो भी सौंपी जाती थी मैं वह दिलो जान से किया करता था। गुरूजी का हर वाक्य मेरे लिए ब्रम्हवाक्य था और उनका हर आदेश मेरे सर आँखों पर था। हिन्दू संस्कृति में सद्गुरु को भगवान से भी उच्च स्थान दिया जाता है. गुरु को प्रसन्न करने के लिए हर संभव कोशिश करना ही एक आदर्श शिष्य का कर्तव्य माना जाता हैं. यही कर्तव्य निभाते हुए अब मैं गुरूजी के चरणों में समर्पित हो चूका था।
गुरु पर संदेह नहीं करना चाहिए , उनपर अविश्वास नहीं करना चाहिए। गुरु जो भी आज्ञा दें उसका आँख मूंदकर पालन करना चाहिए यहीं तो हमारा धर्म सिखाता है. धर्म का पालन करते हुए मैं अब उनका एक आज्ञाकारी सेवक बन गया था। उनकी सेवा भी हो और उनके ज्ञान का प्रचार प्रसार भी हो इसके लिए मैं अपने व्यक्तिगत कामधाम छोड़कर उनके सत्संग शिविर का आयोजन करते हुए गांव गांव शहर शहर घूमता फिर रहा था. मैं एक भी शिविर मिस नहीं करता था. मेरा जागना सोना खाना पीना चलना फिरना सबकुछ गुरुमय हो गया था. इस प्रकार अपने करिअर को दुर्लक्षित कर चौबीसो घंटे गुरुसेवा में ही लीन रहना मेरे घरवालों के लिए चिंता का विषय बन गया था. चिंता होना तो लाजमी था, उनका बेटा जो डॉक्टर बन चूका था , अपने करिअर पर ध्यान देने के बजाय किसी सन्यासी जैसा किसी फ़क़ीर जैसा जीवन जी रहा था.
इसी तरह दस साल कब बीत गए पता ही नहीं चला। इन दस सालों में मैंने कभी भी अपने गुरु पर या उनके ज्ञान पर संदेह नहीं किया. न ही अविश्वास किया। लेकिन अब दस वर्ष बीतने के बाद मेरी आँखे खुलने लगी। कुछ घटनाओ पर मैंने जब गौर किया तब मेरे ध्यान में आने लगा की गुरूजी की शिक्षाएं और उनका स्वयं का आचरण इनके बिच में कई विसंगतियां हैं. वे जो दूसरों को सिखाते है वह स्वयं उनके आचरण में नहीं हैं. उनकी कथनी और करनी में जमीं आसमान का अंतर हैं. हालांकि यह विसंगतिया शुरू से ही थी, लेकिन मैंने भक्ति की आड़ में उन विसंगतियों को अबतक नजरअंदाज कर दिया था. वे एक जीवन्मुक्त गुरु है , वे सभी कर्मबन्धनों से मुक्त है इसलिए वो कुछ भी करते है तो वो सही ही होगा ऐसी सोच मेरी बन गयी थी. ऐसी सोच बनने के पीछे बरसों की प्रोग्रामिंग थी, कंडीशनिंग थी. वे अगर विसंगतिपूर्ण आचरण करते भी है तो यह उनकी "लिला" है ऐसा मानकर शंका के हर विचार को मैं उसके जागते ही नष्ट कर देता था.
लेकिन अब समय आ गया था मेरी दस साल की साधना का हिसाब करने का. दस वर्ष एक काफी लम्बा समय होता है. मैंने अब अपने जीवन के इस दस वर्ष के कालखंड का निरिक्षण परिक्षण और मूल्याङ्कन करना शुरू कर दिया.
मैंने कुछ सवालों किओ सूचि बनायीं. उन सवालों के माध्यम से मैंने अपनी पूरी आध्यात्मिक यात्रा का परिक्षण किया. वे सवाल कुछ इस प्रकार के थे.
१) दस साल पहले मैंने जो परमलक्ष्य निर्धारित करके अपनी यह आध्यात्मिक साधना शुरू की थी, क्या वह अंतिम लक्ष्य मुझे प्राप्त हुआ है ?
२) गुरूजी द्वारा प्रॉमिस किया गया मोक्ष निर्वाण परमज्ञान आत्मसाक्षात्कार परमात्मा क्या मुझे प्राप्त हुआ ?
३) क्या मेरे आलावा हजारो लाखो अन्य शिष्यों में से किसी को भी वह परमज्ञान की अवस्था प्राप्त हुयी?
४) जीवन के शारिरीक मानसिक सामाजिक आर्थिक और आध्यात्मिक इन पांचो स्तरों पर उच्चतम विकास का आश्वासन गुरूजी द्वारा दिया गया था, क्या वह आश्वासन पूरा किया गया? क्या मेरा इन पांचो स्तरों पर विकास हुआ ?
५) दस साल पहले जब मैंने अपनी आध्यात्मिक यात्रा का प्रारम्भ किया था उस वक्त मेरे आतंरिक आनंद का जो स्तर था वह स्तर दस सालो बाद जरा भी बढ़ा क्या?
इनसारे सवालों का जवाब था , "नहीं, बिलकुल नहीं "
इन सवालों ने और इनके जवाबों ने मुझे अंदर से झकझोर कर रख दिया. मेरे पांव तले की जमीन खिसकने लगी. क्योंकि जिस लक्ष्य को पाने के लिए मैंने अपनी जवानी के दस साल , अपना करियर , अपना व्यक्तिगत जीवन दांव पर लगाया था वह लक्ष्य मुझे दूर दूर तक कहीं नजर नहीं आ रहा था. यह एक बहुत बड़ा निवेश था , इन्वेस्टमेंट थी जो मैं कर चूका था मगर बदले में जो प्रॉमिस गुरूजी द्वारा किया गया था वह डिलिव्हर हुआ ही नहीं. इन दस सालो में मेरा व्यक्तिगत नुकसान भी हद से ज्यादा हुआ. आध्यात्मिक जीवन जीने की मशक्कत करते करते मैं व्यावहारिक जिम्मेदारियां निभाने में असफल रहा. जिस उम्र में मेरे सारे दोस्त अपना करिअर सेट करके शादी बच्चे करके सेटल हो गए थे वह उम्र मैं ईश्वर का भजन पूजन करने में गँवा चूका था. मैं बोहोत कुछ खो चूका था. मैं लगभग बर्बाद हो चूका था.
मेरा विवेक और तर्क जो इतने सालों से गहरी नींद सो रहा था अब जागने लगा था. उसी दौरान मैंने ओशो को सुनना शुरू किया. साथ साथ जे. कृष्णमूर्ति , निसर्गदत्त महाराज और मुजी जैसे गुरुओ को भी पढ़ना सुनना शुरू किया. उनकी किताबें पढ़ने से मुझे यह फायदा हुआ की मेरे गुरूजी ने मेरा जो ब्रेनवाश कर रखा था वह धीरे धीरे टूटने लगा। मेरे गुरु का पाखंड उजागर होने लगा. उसने इतने सालो तक मुझे और मेरे जैसे हजारो शिष्यों के भोलेपन का फायदा उठाकर कैसे मुर्ख बनाया था अब मुझे समझ में आने लगा। गुरूजी की काली करतूतों के बारे में भी मुझे पता चलने लगा था. हालांकि अन्य गुरु भी घुमा फिराकर उसी तरह की बकवास दोहरा रहे थे लेकिन कम से कम उन्होंने मुझे अपने पाखंडी गुरु के जंजाल से मुक्त होने में सहायता की.
मेरे गुरु का असली चेहरा अब मेरे सामने खुलता जा रहा था.
फिर मेरे हाथ में यु जी कृष्णमूर्ति नाम के एक दार्शनिक की किताब लगी. इस किताब में गुरु ईश्वर मोक्ष और निर्वाण जैसी कल्पनाओ की सत्यता पर ही सवाल उठायें गए. यु जी कृष्णमूर्ति एक ऐसे दार्शनिक थे जो ईश्वर गुरु धर्म और धर्म पर आधारित पाखंड रूपी बाजार का पुरजोर विरोध करते थे. वे किसी भीं प्रकार की पारलौकिक शक्ति के अस्तित्व को अमान्य कर देते थे. हर गुरु पाखंडी ही होता है क्योंकि वह जिस ईश्वर की बात करता है उस ईश्वर का कोई अस्तित्व है नहीं है, ऐसा वे डंके की चोट पर कहा करते थे. उस किताब ने मुझे इस धर्म मके बाजार पर सवाल खड़े करने का साहस दिया. मुझे एक नया आयाम मिला जो तर्क विवेक और बुद्धिप्रमाण्यवाद की मजबूत नींव पर आधारित था.
अपनी बुद्धि अपना विवेक और तर्क जिसका इस्तेमाल होना चाहिए था, मैं वह तर्क गुरु के चरणों में समर्पित करके किसी मुर्ख जैसा जीवन जीता रहा. मेरे पढ़े लिखे होने पर मुझे अब शर्म आने लगी थी.
लेकिन अब पछताने से कोई फायदा नहीं होनेवाला था. मैं हमेशा से सत्य की खोज पर चलनेवाला एक योद्धा था. हालांकि अबतक इस युद्ध में मेरी हार हुयी थी लेकिनफिर भी मुझे लड़ना था, आगे बढ़ना था. ईश्वर का कोई अस्तित्व नहीं है यही बात तर्क और विवेक से मैं समझ चूका था, लेकिन अब मुझे यह जानना था की इंसान के मस्तिष्क में यह भ्रम आया कहा से है? क्या वजह है जो इंसान को ईश्वर जैसी निराधार कल्पना को सच मानने पर मजबूर कर देती है?
इस सत्य को समझने के लिए फिर मैंने विवेकवाद , बुद्धिप्रामान्यवाद , चार्वाकदर्शन , बुद्धदर्शन जैसे नास्तिक (वास्तववादी) दर्शनशास्त्रो का अभ्यास प्रारम्भ कर दिया. तर्क कैसे किया जाता है , किसी भी विधान को विज्ञान और विवेक की कसौटी पर रखकर कैसे परखा जाता है, सबूतों और तथ्यों के आधार पर सत्य का पता कैसे लगाया जाता है , झूठ को कैसे पकड़ा जाता है इस विषय पर आधारित किताबे पढ़ने लगा. महात्मा जोतिबा फुले , डॉक्टर बाबासाहब आंबेडकर , शहीद भगत सिंह द्वारा लिखित साहित्य पढ़ने लगा. मानसशास्त्र का अभ्यास किया. पुरातत्वशास्त्र के आधार पर ऐतिहासिक तथ्य कैसे परखे जाते है इस विषय का भी अभ्यास किया. डार्विन का उत्क्रांति सिद्धांत, मानववंशशास्त्र का अभ्यास , मानव मस्तिष्क और बुद्धि के क्रमिक विकास में किस तरह से ईश्वर और पारलौकिक शक्तियों जैसे कल्पनिकी भ्रम तैयार होते है , यह सब विज्ञान मैं पढ़ने लगा. रिचर्ड डॉकिन्स और जे. एंडरसन थॉमसन जैसे महान वैज्ञानिको द्वारा लिखी गयी पुस्तके पढ़ी. यह सब पढ़ते पढ़ते मेरी आँखे खुलती गयी. सच क्या है और झूठ क्या हैं इसमें अंतर समझता गया। अब सबकुछ साफ़ साफ़ दिखाई देने लगा. इस प्रकार मेरे ईश्वर और उसपर आधारित सरे भ्रम टूटकर चकनाचूर हो गए.
मुझे समझ में आने लगा की संसार में ईश्वर अथवा कोई भी पारलौकिक शक्ति का अस्तित्व ही नहीं है. यह मनुष्य के मस्तिष्क द्वारा रची गयी कोरी कल्पनाएं है. अपने अज्ञात डरों से राहत पाने के लिए मनुष्य ने ईश्वर की कल्पना रची. इसी कल्पना के आधार पर फिर अनेक धर्मों की रचना हुयी। उन धर्मों का शुरुवाती उद्देश्य था इंसानो से नैतिकतापूर्ण और नियमबद्ध आचरण करवाना। लेकिन अब धर्म वह उद्देश्य भी खो चुके है. अब धर्म और ईश्वर का उपयोग पाखंडी गुरु और राजनेताओं द्वारा भोलेभाले लोगों को मुर्ख बनाकर उनका शोषण करने के लिए किया जाता है.
धर्म और अध्यात्म का यह व्यापार अब मेरे सामने उजागर हो चूका था. और इस तरह से मैं एक आस्तिक से नास्तिक बन गया.
आज मैं पूरी तरह से सभी श्रद्धाओं आस्थाओं से और अंधविश्वासों से मुक्त हो चूका हूँ. अब मेरा समय , ऊर्जा और धन किसी भी तरह के धार्मिक कर्मकांड में खर्च नहीं होता है. मैं अब विवेकवाद , विज्ञान और भारत के संविधान की रह पर चलता हूँ.
मैं ईश्वर के भ्रम से मुक्त तो हुआ, गुरु के जाल से आजाद तो हुआ लेकिन उन दस बारह वर्षो में मैंने बहुत कुछ खोया है. गुरु की भ्रामक और गुमराह करनेवाली बातों में आकर उस समय जो अव्यवहारिक और गलत निर्णय लिए गए थे उसकी कीमत आज तक चूका रहा हूँ. शारीरिक मानसिक और आर्थिक नुकसान झेल चूका हूँ. गुरु और उसका सत्संग सबकुछ एक धोखा था। एक स्कैम था. इस धोखे ने मुझे गहराई तक सदमा पहुंचाया। उस सदमे की वजह से मेरे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गलत परिणाम हुआ. धोखेबाजी के वो जख्म समय के साथ भरते जा रहे है लेकिन मेरे जीवन का अमूल्य समय और कुछ अनमोल लोग जो मैं गँवा चूका हूँ वह कभी लौटकर नहीं आएगा।
टिप्पण्या
टिप्पणी पोस्ट करा